नारीवाद की हमारे समाज को आज के वक़्त मैं कितनी ज़रूरत है इसपे मैं बहुत ज़्यदा बेहस नहीं करूँगा। इतना साहस ज़रूर है मेरे अंदर, इस तथ्य को मैं आप सब के सामने कुबूल करता हूँ की मैं कुछ समय पेहले इस 18वी सदी के पेहलू (नारीवाद) से काफी हद तक सेहमत नहीं था। इसका कारण मैं शयद ये समझता हूँ की मैं कभी वो नज़रिया पैदा नहीं कर पाया जो हमेशा मुझे ये समझाने की कोशिश में लगा रहा की अब औरतों के किरदार, उनके हक़ और उनके दांव काफी बदल गए हैं।

अब कितने घरेलू प्रताड़ना और दहेज़ के केस दर्ज हुए और कितनी औरतों ने कानून का गलत फायेदा उठाया इसके चक्कर मैं पड़ेंगे तो हम नारीवाद के सही मकसद को भूल बैठेंगे। आप बात चाहें मेधा पाठ्कर की करें या सुनीता नारायणा की, आपको बहुत ज़्यदा भेद नहीं नज़र आएगा। उसका कारण यह है की इन औरतों के किरदार वही किरदार निकले जिनको इस बढ़ते और असेहेंशील समाज को ज़रूरत थी। आज समाज मैं वो नारी भी है जो खुद गाड़ी चला कर कॉलेज मैं लेक्चर देती है और साथ ही साथ  समाज के पीड़ित तबके के लिये अवाज़ भी उठा रही है तो वहीं दूसरे हाथ पर, वो नारी भी है जो अकेले अपने दम पर खेती कर के अपना परिवार चला रही है, जब की उस परिवार के सारे मर्द बैठे गांजा और शराब के नशे मैं धुत्त हैं। (अल्मोड़ा जनपद के अधिकतर गाँवो मैं यही हालत है)

अब हमे ये देखना है की क्या नारिवाद एक आंदोलन का रूप ले पाएगा या उसे अन्य आयोजनो की तरह रौंद दिया जाएगा। आज नारिवाद की सीमा रेखा बदलती नज़र आती है फिर चाहे वो दीपिका पदुकोण की “वुमेन एम्पोवेर्मेंट” पर वीडियो हो जिसमे कपडो के पेहनावे को नारीवाद का स्तम्भ बनाया हो या फिर पी.टी ऊशा और साइना नेहवाल की एतिहासिक जीत जिसने नारीवाद को एक नई छ्वि दी। मलाला यौसफ्ज़ै का कारनामा मन को बहुत प्रफुल्लित करता है पर “निर्भया” जैसे कांड दिल को आज भी देहला देते है। महिलाओ की आर्थिक स्थिति मैं बहुत ज़्यादा सुधार तो नहीं आया है पर अब एक एकाग्रिता और द्मदार अवाज़ इन सब के पीछे सुनाई ज़रूर पड्ती है।

आज बात चाहे खाप पंचयात के महिला सरपंच की हो या आंगंवाडी कार्यकर्ता की, कौन नारीवाद का सही संस्करण लेके चल रहा है ये हमे ही तय करना है। समाज मैं नारीवाद की उभर्ती तस्वीर को हमे समझ्ना होगा। नारीवाद को एक हथियार नही बल्कि एक सोच की तरह इस्तेमाल करना होगा। वक़्त अब शायद से है की महिलाओ के हक़ और उनके दांव दोनो को इज़्ज़त दी जाए और शायद यही एक बदलती वास्तविकता का जीता जागता उधारण है।

Author: Rishabh Shrivastava, Founder (Analysis)

You can reach author at: eic.analysis@gmail.com  

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