आज स्वतंत्र भारत के 70 स्वर्णिम साल पूरे हो गए| इससे पहले जब मैं मंगल पाण्डेय या रानी लक्ष्मी बाई के बारे में सोचता हूँ, तो लगता है की उस समय आज़ादी का ख्याल किसी टूटे हुए सपने से कम नहीं लगता रहा होगा| पर वक़्त बदला; भगत सिंह, नेहरु, गाँधी, बोस इन सब महान पुरुषों ने भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए हर संभव कीमत दी और आज भारत देश उन्नत्ति की राह पर अग्रसर है|

मैं आज यह बात इसीलिए नहीं लिख रहा हूँ की हमने अपनी आज़ादी कैसे पाई, पर, इसीलिए, की आज 70 साल पूरे होने पर भी, हम अपनी आज़ादी की नीव को मज़बूत न बना सके| आप सब मेरी यह बात से सहमत हो या ना हो पर, यह सच है की जो आज़ादी आम्बेडकर या पटेल साहब ने हमे दी थी उससे हम पूरी तरह से बर्बाद कर चुके हैं| मौका स्वतंत्रता दिवस की ख़ुशी मनाने का है, परन्तु किसी को तो आइना दिखलाना होगा| और चिंता मत कीजिए मैं भी आप मैं से ही हूँ, बात बस इतनी है की मुझे फर्क पड़ता है, शायद आपको भी!

दिल्ली में सड़क पर चलते आदमी को एक ऑटो टक्कर मार कर उसको रौंद के निकल जाता है, आते जाते लोग उस आदमी का लाल खून देख के भी, रुक के उसे उठाने की जुर्र्हत नहीं करते| यही स्थिति आज से कुछ साल पहले थी; जब सर्द दिसम्बर की रात मैं, रोड के किनारे, “निर्भया” दर्द से तड़प रही थी और एक इंसान रुका नहीं| उसके बाद हम सब हाथों में मोमबत्ती लिए सरकार से लड़ने को तैयार ज़रूर थे| अगर आज एक तरफ इरोम शर्मीला और दीपा करमाकर के सफल होने का जश्न मन रहा है तो वहीँ दूसरी ओर बुलंदशहर रेप केस की घटना हमे शर्म होने पर मज़बूर ज़रूर करती है|

लोगों के हिसाब से कांग्रेस ने देश को खाया, मनमोहन सिंह जी ने कोयला घोटाला में खूब कमाया और मोदी जी ने सिर्फ विदेश भ्रमण किया| एक तरफ सरकार आर्थिक विकास के नीव को ठोस बनना चाहती है तो वहीँ दूसरी ओर दलित वर्ग की वही दर्दनाक स्थिति है| मेरा दोस्त मुझसे एक दिन बोलता है की “मेरा गटर अगर चोक होगा तो वही (सफाईकर्मचार्री) घुसेगा अब में थोड़ी न घुसूंगा अंदर और मशीन अंदर तक आ नहीं सकती|” अगर आज बेज़्वाडा विल्सन के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन एक ढोंग है तो उसमें क्या गलत है? ऐसा तो नहीं हैं ना की आपके घर के सीवर चोक होने पर आप खुद उसे साफ़ करते होंगे? या आज रेलवे स्टेशन पर (या दिल्ली की गलियों मे) आपको लोग मूंह तक भरे काले गटर मैं डूबे दिखाई नहीं पड़ते? पड़ते भी होंगे तो क्या? हम आँख बंद कर लेना ज्यादा पसंद करते हैं, मेरा दोस्त इसका जीता जागता उदहारण है|

Climate change, environment की आज हम सब बात करना पसंद करते हैं; शायद इसलिए भी की इस 21वी सदी में हमे अपने कपड़ो के साथ साथ दिमागी तौर पे भी अपडेटेड रहना है| i-phone, एप्पल, volkswagen शायद इन सब से ऊपर अब हमारी सोच जा ही नहीं सकती, consumerism उसका बहुत बड़ा कारण है| odd-even के रूल पर दो गाड़ियाँ रखना है, महंगा सूट पेहेन कर a/c कार और दफ्तर में बैठना है, i-phone का हर अपडेट आने पर हमे उसे खरीदना है, और फिर सरकार अगर पेरिस समिट में फ़ैल हो जाए तो गाली भी हमे ही देनी है| मुरादाबाद में अगर आज सबसे ज्यादा गैर कानूनी ई-वेस्ट डंपिंग और रीसाइक्लिंग साइट्स हैं (जो ना केवल पर्यावरण बल्कि स्वास्थ के लिए हानिकारक है) तो उसके लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं| इन साइट्स पर जो लोग काम कर के अपनी आँख और फेफड़ो की क्षमता को खो रहे हैं, उसके लिए भी हम ही ज़िम्मेदार हैं|

सोशल मीडिया की रौनक ने आज हम सबको को अंधा कर रखा है| आज हम इन ट्रॉल्स और सेल्फी की दुनिया से बहार नहीं निकलना चाहते| रूबी राय से लेके सलमान खान तक सब की इज्ज़त इस सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर नीलाम हो रही है| हसने के लिए AIB जैसे गाली भरे और बेहूदा चैनल का हमे सहारा लेना पड़ रहा है, मसान जैसी मूवीज लोगों के दिलों में जगह नहीं बना पा रही हैं, और लोग ओलिंपिक में खेल रहे खिलाडियों की सारे आम आलोचना करते हैं ये जाने बिना की भारत में क्रिकेट को छोड़ कर कितने खेलों के लिए पर्याप्त और सामान्य ट्रेनिंग सुविधाएं हैं? इन खिलाड़ियों को जब तक ये मैडल नहीं लाते, हम इन्हें पहचानते तक नहीं हैं|

पंजाब जैसा राज्य नशे की जंग हार रहा है| आधा यूथ हमारे देश का आज सूई और धुएं की लत से झूझ रहा है| एकाउंटेबिलिटी और गुड गवर्नेंस के नाम पर र.टी.आई जैसे क़ानून का गलत इस्तेमाल हो रहा है, और सही इस्तेमाल करने वाले अपनी जान गवाए बैठे हैं| मीडिया, वाणी के मरने का विडियो 10 बार दिखा सकती है लेकिन छत्तीसगढ़ में सोनी सूरी या नियमगिरि में आदिवासियों का संघर्ष नहीं दिखा सकती, क्योंकि उनसे मीडिया हाउसेस का खर्चा नहीं निकलता| पॉलिटिक्स और मीडिया का कनेक्शन इतना ज़ोरदार है की रातों रात व्यापम जैसे घोटाले मुख्य चर्चा से गायाब हो जाते हैं|

आज हमे अच्छे कॉलेज मैं दाखिला भी लेना है, ऊँची नौकरी भी चहिए, SC/ST के रिजर्वेशन से भी दिक्कत है- पर अपने क्लब कल्चर या मेट्रो लाइफ से कहीं कोई समझौता नहीं करना है| आरएसएस और विहिप जैसे संघटन हमारे और आपके चुप होने का जी भर के फायेदा उठा रहे हैं, तो वहीँ दूसरी ओर कन्हैया कुमार और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेता बेहेतरीन नाटक करते हैं| डेमोक्रेसी का हर सरकार ने खूब मजाक उड़ाया है और हमने पढ़े लिखे होने के बवाजूद, अपने वोट डालने के अधिकार को सिर्फ एक औपचारिकता समझा|

आज के इस यूथ को ना तो देश के संविधान में कोई भरोसा रह गया है ना ही इस सरकार में| शाम होने पर पूरी बहस इस बात पर ख़त्म होती है की, आदमी अपना घर चलाए और रोटी खिलाये या फिर इस बेमतलब की बातों पर अपना वक़्त जायर करे| आज कोई सही या गलत नहीं सुनना चाहता| बच्चों से लेके माँ बाप तक, सब की अपनी प्राथमिकताएं बंधी हुई हैं, जिनसे कोई अलग नहीं सोचना चाहता| जॉब सिक्यूरिटी और लाइफ में “चिल्ल” (Chill) एलिमेंट होना ज़रूरी हो गया है|

देश आज आर्थिक असमानता, किसानों की आत्महत्या और गरीबी के बोझ में दबा चला जा रहा है तब भी कोई बाटने या मिलके सहयोग दे के चलने मे विश्वास नहीं रखता| प्राइवेटाइज़ेशन और कॉर्पोरेट की इस दुनिया का रंग बहुत निराला है, जो हम सब को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है| भ्रष्ट और ताकतवर सरकार के सामने, कानून और इंसाफ, दोनो घुटने टेक रहे हैं|

70 साल आज़ादी के पूरे होने पर भी भारत का सबसे खूबसूरत राज्य, कश्मीर, अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा होगा, कर्फ्यू लगा हुआ होगा| सेना पेल्लेट्स फायर कर रही होगी, लोग पथराव कर रहे होंगे और मोदी जी एतिहासिक लाल किले से देश को संभोदित कर रहे होंगे|

मेरे सभी साथियों को भारत के 70वे स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं|

Author: Rishabh Shrivastava, Founder and Editor-in-Chief of Analysis

You may reach author at: eic.analysis@gmail.com 

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