तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में आंदोलन थमा ही था की एक बार फिर महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के किसानो ने सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। क़र्ज़ माफ़ी, समर्थन मूल्य नहीं मिलना, बोनस नहीं मिलना, ज़मीन अधिग्रहण, फ़सल बीमा ऐसे बहुत सारे मुद्दों को लेकर देश के किसान भाइयों में असंतोष है । भारत में किसानो द्वारा आत्महत्या बहुत आम मुद्दा बन चुका है जो की शर्मनाक है लेकिन किसानो की हत्या ने तो लोकतंत्र पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है ।

क्यों देश का किसान तड़प रहा है

देश का किसान ग़लत सरकारी नीतियों के कारण तड़प रहा है, एक ऐसी नीति जिसमें देश के किसानो से ज़्यादा विदेश के किसानो को ध्यान में रखा गया है । पिछले तीन सालों में कृषि क्षेत्र में 65,000 करोड़ का आयात बढ़ा है और इतने ही प्रतिशत निर्यात कम हुआ है। इस आयात और निर्यात के खेल को देख कर लगता है की सरकार को विदेश के किसानो की ज़्यादा चिंता है ।
कितना हास्यास्पद है की देश में कृषि में इम्पोर्ट ड्यूटी ज़ीरो कर दी गयी है और एक्सपोट ड्यूटी में निरंतर इज़ाफ़ा हो रहा है ।

मध्यप्रदेश के किसानो की दास्ताँ

वास्तविकता यह है कि आज अन्नदाता को क़ीमत के बदले गोली मिल रही है। सरकार अगर बड़े उद्योगपतियों के क़र्ज़ माफ़ कर सकती है तो क्या किसानो कर क़र्ज़ माफ़ नहीं कर सकती । देश में बमपर उत्पादनका यश गान करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह कहते रहे की 975 लाख टन गेहूँ का उत्पादन हुआ है तो क्यों 50 लाख टन गेहूँ इम्पोर्ट किया गया,4 लाख मेट्रिक टन दाल इम्पोर्ट किया गया, 21 लाख आग्रिकल्चर पम्प के मीटर उतार दिए गए और जब आंदोलन किया तो गोलियाँ बरसा दी । हँसी आती है यह जानकार की जिस मध्यप्रदेश में पाँच किसानो की हत्या की गयी उस प्रदेश को पाँच बार कृषि कर्मण पुरस्कार भी मिला है। सरकार कहती है की हम इसकी न्यायिक जाँच कराएँगे लेकिन कटु सत्य तो यह है कि आज तक किसी भी न्यायिक जाँच की रिपोर्ट नहीं आयी और जो आयी भी उसमें महज़ खानापूर्ति की गयी । 2012 में रायसेन में भी किसानो पर गोलियाँ चलायी गयी थी जिस पर बड़ी शान से न्यायिक जाँच करवायी गयी लेकिन आज तक उसकी रिपोर्ट नहीं आयी । हत्या होना बहुत बड़ी बात है, चिंतनीय विषय है लेकिन क्या वजह रही होगी की हमारे किसान भाई इतने आक्रोशित हो गए । सैकड़ों गाड़ियाँ फूँक दी, कलेक्टर पर हमला बोल दिया । इस आंदोलन को भटकाया गया है, हर राजनैतिक दल ने अपनी रोटी सेकने का भरसक प्रयास किया है । सरकार द्वारा जवाबी कार्यवाही भी अमानवीय थी और अब मुआवज़ा देकर हितैषी बनने का प्रयास कर रही है ।

छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों की दास्ताँ

मज़ेदार कह लो या शर्मनाक कह लो , हमारे प्रदेश को धान का कटोरा कहा जाता है और बिना चुके हर साल हमें भी कृषि कर्मण पुरस्कार मिलता है लेकिन प्रदेश में किसानो को बोनस प्राइज़ और समर्थन मूल्य नहीं मिलता है । सच कहु तो प्रदेश में किसानो की दशा बहुत ख़राब है । रायपुर, पत्थलगाँवँ आदि में आंदोलन बहुत हुए लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं मिला, लेकिन झूठे आश्वासन ज़रूर मिले । छत्तीसगढ़ के किसान स्वभाव से बेहद सरल एवं भोले है, यह के किसानो का दिल बहुत बड़ा है, चुप चाप सब कुछ बर्दाश्त करता है। आशा करता हूँ प्रदेश के किसान शांतिपूर्वक अपने हक़ की लड़ाई लड़ेंगे और लोकतंत्रिक तरीक़े से अपना मत रखेंगे अंत में एक छोटी सी विनती प्रदेश के मुखिया डॉक्टर रमन सिंह जी से, डॉक्टर साहब पूरा प्रदेश आपको चाउर वाले बाबा कहता है, इस बार उन चाउर उगाने वालों के पक्ष मे नीति बनाए और ठोस निर्णय लेकर सभी किसान भाइयों को बोनस प्राइज़ और उचित समर्थन मूल्य दीजिए

 

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जिनेंद्र पारख

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